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मालाचुआ और शाहपुर छात्रावास में बदहाली का आलम, जिम्मेदार सो रहे कुंभकरण की नींद! कलेक्टर के निरीक्षण ने खोली वर्षों की अव्यवस्था की पोल
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कैलाश अहिरवार
राजनीति
📅 27 Aug 2026, 2:54 PM🕐 27 Aug 2026⏱ पढ़ने का समय: 1 मिनट
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मालाचुआ और शाहपुर छात्रावास में बदहाली का आलम, जिम्मेदार सो रहे कुंभकरण की नींद! कलेक्टर के निरीक्षण ने खोली वर्षों की अव्यवस्था की पोल
टपकती छत, फटे-पुराने कंबल-चादर और जर्जर बिस्तरों के बीच रहने को मजबूर आदिवासी बच्चे; नया भवन तैयार फिर भी हैंडओवर नहीं, अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
मालाचुआ/शाहपुर( उमरिया)
जिले के दूरस्थ आदिवासी अंचलों में संचालित छात्रावासों की व्यवस्थाओं को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मालाचुआ और शाहपुर छात्रावास में निरीक्षण के दौरान सामने आई बदहाली ने जनजातीय कार्य विभाग की व्यवस्थाओं और जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिया है। शाहपुर छात्रावास में बारिश के दौरान कमरों की छत से पानी टपकने, फटे-पुराने कंबल एवं चादर, पुराने गद्दे, गंदे बिस्तर और अन्य मूलभूत व्यवस्थाओं की स्थिति बेहद खराब पाए जाने की बात सामने आई है।
कलेक्टर के निरीक्षण में खुली छात्रावास की बदहाली
मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान के दौरान अधिकारियों के निरीक्षण में छात्रावास की वास्तविक स्थिति सामने आई। निरीक्षण के दौरान छात्रावास में बच्चों को उपलब्ध कराई जा रही सुविधाओं की स्थिति देखकर अधिकारियों ने नाराजगी व्यक्त की। बताया गया कि सहायक आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग उमरिया पूजा द्विवेदी और संजय पाठक सहित मौके पर उपस्थित हॉस्टल अधीक्षक तोमन यादव तथा विद्यालय के प्रभारी प्राचार्य को छात्रावास की बदहाल व्यवस्था को लेकर फटकार लगाई गई।
निरीक्षण के दौरान छात्रावास में फटे-पुराने कंबल, चादर, अत्यधिक पुराने गद्दे और बिस्तरों के कपड़े सहित अन्य व्यवस्थाओं की स्थिति सामने आई। बारिश के मौसम में कई कमरों में पानी टपकने की समस्या भी बताई गई। ऐसे हालात में आदिवासी बच्चों को सुरक्षित, स्वच्छ और सम्मानजनक आवासीय वातावरण उपलब्ध कराने के सरकारी दावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
टपकती छत के नीचे पढ़ाई और रात गुजारने की मजबूरी
शाहपुर छात्रावास में बारिश के दौरान कमरों की छत से पानी टपकने के कारण बच्चों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। जिन कमरों में बच्चों को पढ़ाई और आराम करना चाहिए, वहां बारिश का पानी पहुंचने की स्थिति बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य दोनों के लिए चिंता का विषय है।
एक तरफ शासन आदिवासी विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा के साथ सुरक्षित आवासीय सुविधा देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ छात्रावास की मौजूदा स्थिति विभागीय व्यवस्थाओं की गंभीर कमियों को उजागर करती दिखाई दे रही है।
नया भवन बनकर तैयार, फिर भी पुराने जर्जर भवन में बच्चे
इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि शाहपुर छात्रावास के लिए नया भवन तैयार है। इसके बावजूद भवन का जनजातीय कार्य विभाग द्वारा अब तक हैंडओवर नहीं लिया गया है। परिणामस्वरूप बच्चे पुराने भवन में रहने को मजबूर हैं।
बताया जा रहा है कि नए भवन के हैंडओवर को लेकर पीआईयू और विभाग के बीच वर्षों से प्रक्रिया चल रही है। लेकिन सवाल यह है कि यदि वर्षों से नया भवन तैयार है तो उसकी औपचारिक प्रक्रिया को शीघ्र पूरा कर बच्चों को सुरक्षित भवन में स्थानांतरित क्यों नहीं किया जा रहा? बताया जा रहा है कि नया भवन भी गुणवत्ता विहीन है इस कारण से कोई हैंडोवर लेने को तैयार नहीं है। तो आप प्रश्न है उठना है कि नए भवन में भी क्या बजट का बंदर बांट हुआ है?
बारिश के मौसम में पुराने भवन की स्थिति पहले से ही खराब है। ऐसे में तैयार भवन का उपयोग नहीं होना प्रशासनिक संवेदनशीलता और विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
वर्षों की अव्यवस्था देखकर उठ रहा बड़ा सवाल—छात्रावास का बजट आखिर जाता कहां है?
छात्रावास में लंबे समय से चली आ रही अव्यवस्था को लेकर अब सबसे बड़ा सवाल छात्रावास के रखरखाव और व्यवस्थाओं के लिए मिलने वाले बजट को लेकर उठ रहा है। यदि शासन द्वारा बच्चों के बिस्तर, कंबल, चादर, भवन रखरखाव, स्वच्छता और अन्य मूलभूत सुविधाओं के लिए राशि उपलब्ध कराई जाती है, तो वर्षों बाद भी बच्चों को फटे-पुराने कंबल और जर्जर बिस्तरों के बीच क्यों रहना पड़ रहा है?
क्या छात्रावास की व्यवस्थाओं की नियमित निगरानी नहीं होती? क्या जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा समय-समय पर भौतिक सत्यापन नहीं किया जाता? क्या बच्चों को उपलब्ध कराई जाने वाली सुविधाओं का निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित है?
इन सवालों का जवाब जनजातीय कार्य विभाग को देना होगा।
अधीक्षक की अनुपलब्धता भी बनी समस्या
निरीक्षण के दौरान छात्रावास अधीक्षक की उपलब्धता को लेकर भी समस्या सामने आने की बात कही गई। यदि छात्रावास में रहने वाले बच्चों की प्रतिदिन की सुरक्षा, भोजन, साफ-सफाई, स्वास्थ्य और अनुशासन की जिम्मेदारी अधीक्षक की है, तो उनकी नियमित उपलब्धता सुनिश्चित करना विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
बच्चे सरकारी संरक्षण में छात्रावास में रहते हैं। इसलिए किसी भी प्रकार की लापरवाही को सामान्य प्रशासनिक कमी मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अधिकारी ने भी माना—व्यवस्थाओं में समस्या है
जनजातीय कार्य विभाग के अधिकारी संजय पांडेय ने भी छात्रावास में व्यवस्थाओं से संबंधित समस्याएं होने की बात स्वीकार की है। उनके अनुसार व्यवस्थाओं में सुधार कराया जा रहा है। तो अब प्रश्न उठता है कि इतने दिनों से सुधार की आवश्यकता क्यों महसूस नहीं हुई जिम्मेदारों को। अधीक्षक की अनुपलब्धता को भी समस्या बताया गया है। नए भवन के संबंध में पीआईयू से चर्चा करने तथा पूरे मामले की जांच कराने की बात कही गई है।
अब सवाल यह है कि जांच और सुधार की प्रक्रिया कितनी तेजी से आगे बढ़ती है और बच्चों को वास्तविक राहत कब मिलती है।
क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी?
शाहपुर छात्रावास की बदहाल स्थिति को लेकर अब जिला प्रशासन की कार्रवाई पर निगाहें टिक गई हैं। यदि निरीक्षण में व्यवस्थाओं की गंभीर कमियां सामने आई हैं और जिम्मेदार अधिकारियों को मौके पर ही नाराजगी एवं फटकार का सामना करना पड़ा है, तो क्या इसके बाद जवाबदेही भी तय की जाएगी?
सवाल सहायक आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग से लेकर छात्रावास अधीक्षक और स्थानीय स्तर पर व्यवस्था देखने वाले जिम्मेदार अधिकारियों तक पहुंचता है। आखिर नियमित निरीक्षण के बावजूद बच्चों को लंबे समय से ऐसी परिस्थितियों में क्यों रहना पड़ा?
क्या आदिवासी बच्चों का हक लापरवाही की भेंट चढ़ रहा है?
सरकार की मंशा स्पष्ट है कि आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चों को शिक्षा के साथ सुरक्षित आवासीय वातावरण उपलब्ध कराया जाए। लेकिन यदि छात्रावास में फटे पुराने बिस्तर, गंदे कपड़े, जर्जर गद्दे और बारिश में टपकती छत जैसी समस्याएं बनी हुई हैं, तो यह व्यवस्था की गंभीर विफलता है।
ऐसे में यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि क्या छात्रावास के लिए उपलब्ध बजट का समुचित उपयोग हो रहा है? क्या खरीद और रखरखाव की प्रक्रिया की नियमित जांच होती है? क्या जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय होती है?
भ्रष्टाचार के आरोपों की भी हो निष्पक्ष जांच
छात्रावास की वर्षों पुरानी बदहाली को देखते हुए स्थानीय स्तर पर बजट के उपयोग और व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि किसी अधिकारी या कर्मचारी पर भ्रष्टाचार का आरोप बिना जांच के साबित नहीं माना जा सकता, लेकिन मौजूदा परिस्थितियां वित्तीय एवं प्रशासनिक रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच की जरूरत जरूर पैदा करती हैं।
छात्रावास को मिलने वाले बजट, खरीदी गई सामग्री, बिस्तर एवं अन्य सामान की उपलब्धता, स्टॉक रजिस्टर, भुगतान अभिलेख और वास्तविक भौतिक स्थिति का मिलान कराया जाए तो तस्वीर स्पष्ट हो सकती है।
कलेक्टर राखी सहाय से कार्रवाई की उम्मीद
अब बड़ा सवाल यह है कि जिला प्रशासन इस मामले में क्या कार्रवाई करता है। क्या शाहपुर और मालाचुआ छात्रावास की व्यवस्थाओं की विस्तृत जांच कराई जाएगी? क्या नए भवन का हैंडओवर तत्काल कराया जाएगा? क्या बच्चों को नए भवन में सुरक्षित स्थानांतरित किया जाएगा? क्या पुराने भवन की मरम्मत और मूलभूत सुविधाओं की तत्काल व्यवस्था होगी? और सबसे महत्वपूर्ण—यदि जांच में लापरवाही या वित्तीय अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर क्या कार्रवाई होगी? छात्रावास की अवस्था में भारी कमियां उजागर हुई तो क्या फिर भी जिम्मेदारों पर नहीं होगी कार्रवाई? जांच क्या कागजों तक ही सिमट कर रह जाएगी?
आदिवासी बच्चों का भविष्य किसी भी प्रशासनिक लापरवाही से बड़ा है। छात्रावास में रहने वाले बच्चे किसी सुविधा के लिए एहसान नहीं मांग रहे, बल्कि उन्हें शासन द्वारा निर्धारित सुविधाओं का अधिकार है।
अब बच्चों को इंतजार है कि कब बदलेगी व्यवस्था और कब मिलेगा उन्हें सुरक्षित, स्वच्छ एवं सम्मानजनक आवासीय माहौल।